Verses on the Recognition of the Lord· 14.2 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.2

14.2
एष प्रमाता मायान्धः संसारी कर्मबन्धनः विद्याभिज्ञापितैश्वर्यश् चिद्घनो मुक्त उच्यते ॥२॥
eṣa pramātā māyāndhaḥ saṃsārī karmabandhanaḥ vidyābhijñāpitaiśvaryaś cidghano mukta ucyate
— यह ; — प्रमाता ; — माया से अन्धा ; — संसारी, संसरणशील ; — कर्म से बद्ध ; — जिसका ऐश्वर्य विद्या के द्वारा प्रकाशित कर दिया गया है ; — चिद्घन — चित् का सघन पुंज ; — मुक्त (भूत कृदन्त) ; — कहलाता है (कर्मवाच्य, √वच्)

यह प्रमाता, माया से अन्धा, संसारी, कर्म से बद्ध — बद्ध जीव (कहलाता है); किन्तु जब विद्या के द्वारा (उसका) ऐश्वर्य प्रकाशित कर दिया जाता है, तब चित्-घन होकर मुक्त कहलाता है।