Verses on the Recognition of the Lord· 14.1 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.1

14.1
तत्रैतन् मातृतामात्रस्थितौ रुद्रो ऽधिदैवतम् भिन्नप्रमेयप्रसरे ब्रह्मविष्णू व्यवस्थितौ ॥१॥
tatraitan mātṛtāmātrasthitau rudro 'dhidaivatam bhinnaprameyaprasare brahmaviṣṇū vyavasthitau
— वहाँ, उस विषय में ; — यह ; — केवल मातृता (शुद्ध प्रमातृ-भाव) की स्थिति में ; — रुद्र ; — अधिदेवता — अधिष्ठाता देव ; — भिन्न प्रमेयों के प्रसार (विस्तार) में ; — ब्रह्मा और विष्णु (द्विवचन) ; — व्यवस्थित (अधिष्ठाता रूप में स्थित) (द्विवचन, भूत कृदन्त)

वहाँ, केवल मातृता (शुद्ध प्रमातृ-भाव) की स्थिति में, रुद्र अधिदेवता हैं; और भिन्न प्रमेयों के प्रसार (विस्तार) में ब्रह्मा और विष्णु (अधिष्ठाता रूप में) व्यवस्थित हैं।