Verses on the Recognition of the Lord· 14.11 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.11

14.11
कलोद्बलितम् एतच् च चित्तत्त्वं कर्तृतामयम् अचिद्रूपस्य शून्यादेर् मितं गुणतया स्थितम् ॥११॥
kalodbalitam etac ca cittattvaṃ kartṛtāmayam acidrūpasya śūnyāder mitaṃ guṇatayā sthitam
— कला से उद्बलित (शक्ति-सम्पन्न किया हुआ) ; — यह ; — और ; — चित्-तत्त्व ; — कर्तृता-मय ; — अचित्-स्वरूप (का) ; — शून्य आदि का ; — सीमित, मित (भूत कृदन्त) ; — गुण (गौण धर्म) के रूप में ; — स्थित रहता है (भूत कृदन्त)

और कला से उद्बलित (शक्ति-सम्पन्न) किया हुआ, कर्तृता-मय यह चित्-तत्त्व — सीमित होकर — अचित्-स्वरूप शून्य आदि का गुण (गौण धर्म) बनकर स्थित रहता है।