मुख्यत्वं कर्तृतायाश् च बोधस्य च चिदात्मनः
शून्यादौ तद्गुणे ज्ञानं तत्समावेशलक्षणम् ॥१२॥
mukhyatvaṃ kartṛtāyāś ca bodhasya ca cidātmanaḥ
śūnyādau tadguṇe jñānaṃ tatsamāveśalakṣaṇam
— मुख्यत्व — प्रधानता (का पुनः उदय); — कर्तृता की; — और; — बोध की; — और; — चित्-स्वरूप (का); — शून्य आदि में; — जो उसका गुण (गौण रूप) बन गया था; — (वह) ज्ञान; — जिसका लक्षण उस (चैतन्य) में समावेश (तादात्म्य) है
कर्तृता तथा चित्-स्वरूप बोध की प्रधानता का — शून्य आदि में, जो उसका गुण (गौण रूप) बन गया था — (पुनः उदय) ही वह ज्ञान है, जिसका लक्षण उस (चैतन्य) में समावेश (तादात्म्य) है।