Verses on the Recognition of the Lord· 14.13 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.13

14.13
शून्ये बुद्ध्याद्यभावात्मन्य् अहन्ताकर्तृतापदे अस्फुटारूपसंस्कारमात्रिणि ज्ञेयशून्यता ॥१३॥
śūnye buddhyādyabhāvātmany ahantākartṛtāpade asphuṭārūpasaṃskāramātriṇi jñeyaśūnyatā
— शून्य में ; — जिसका स्वरूप बुद्धि आदि का अभाव है ; — जो (मात्र) अहन्ता और कर्तृता का पद (स्थान) है ; — जिसमें केवल अस्फुट और रूप-रहित संस्कार ही रहते हैं ; — ज्ञेय की शून्यता

उस शून्य में — जिसका स्वरूप बुद्धि आदि का अभाव है, जो अहन्ता और कर्तृता का पद (स्थान) है, जिसमें केवल अस्फुट और रूप-रहित संस्कार ही रहते हैं — ज्ञेय की शून्यता (होती है)।