Verses on the Recognition of the Lord· 12.3 / 21

Verses on the Recognition of the Lord12.3

12.3
यद् असत् तद् असद्युक्ता नासतः सत्स्वरूपता सतो ऽपि न पुनः सत्तालाभेनार्थो ऽथ चोच्यते ॥३॥
yad asat tad asadyuktā nāsataḥ satsvarūpatā sato 'pi na punaḥ sattā-lābhenārtho 'tha cocyate
— जो असत् है ; — वह ; — असत् से युक्त ; — नहीं (है) ; — असत् की ; — सत्-स्वरूपता (सत् बन जाना) ; — सत् की ; — भी ; — फिर नहीं (कोई) ; — सत्ता की प्राप्ति से ; — प्रयोजन ; — और फिर भी ; — कहा जाता है (कुछ लोगों द्वारा) (कर्मवाच्य, √वच्)

जो असत् है वह असत् से ही युक्त रहता है; असत् को सत्-स्वरूपता प्राप्त नहीं होती; और सत् को भी सत्ता प्राप्त करने में कोई प्रयोजन नहीं — और फिर भी (कुछ लोग ऐसी कार्य-उत्पत्ति) कहते हैं।