Verses on the Recognition of the Lord· 11.7 / 17

Verses on the Recognition of the Lord11.7

11.7
पृथग्दीपप्रकाशानां स्रोतसां सागरे यथा अविरुद्धावभासानाम् एककार्या तथैक्यधीः ॥७॥
pṛthagdīpaprakāśānāṃ srotasāṃ sāgare yathā aviruddhāvabhāsānām ekakāryā tathaikyadhīḥ
— अनेक दीपों के पृथक् प्रकाशों के ; — स्रोतों (नदियों) के ; — सागर में ; — जैसे ; — परस्पर अविरुद्ध आभासों के ; — एक कार्य (एक प्रयोजन) उत्पन्न करने वाली ; — वैसे ; — ऐक्य-धी — एकता का ज्ञान

जैसे अनेक दीपों के पृथक् प्रकाश (एक प्रकाश में मिल जाते हैं), अथवा जैसे स्रोत (नदियाँ) सागर में (मिल जाते हैं), वैसे ही परस्पर अविरुद्ध आभासों की एकता का ज्ञान एक कार्य (एक प्रयोजन) उत्पन्न करता है।