rajataikavimarśe 'pi śuktau na rajatasthitiḥ
upādhideśāsaṃvādād dvicandre 'pi nabho 'nyathā
— '(यह) रजत है' इस एक विमर्श के होने पर; — भी; — शुक्ति (सीप) में; — नहीं (है); — रजत की (वास्तविक) स्थिति; — उपाधि (विशेषण) रूप देश (और काल) के असंवाद (अमेल) के कारण; — द्विचन्द्र (दो चन्द्र के प्रत्यक्ष) में; — भी; — आकाश (लोचन/आश्रय); — अन्यथा (सच्चे दूसरे चन्द्र से भिन्न)
'(यह) रजत है' इस एक विमर्श के होने पर भी शुक्ति में रजत की वास्तविक स्थिति नहीं होती, क्योंकि उपाधि (विशेषण) रूप देश (और काल) का संवाद (मेल) नहीं होता; और द्विचन्द्र (के प्रत्यक्ष) में भी आकाश अन्यथा (सच्चे दूसरे चन्द्र से भिन्न फल देता) है।