Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.7 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.7

9.7
एवं हि सर्वभावेषु चराम्यनभिलक्षितः । भूतप्रकृतिमास्थाय सहैव च विनैव च ॥ ९-७ ॥
evaṃ hi sarvabhāveṣu carāmyanabhilakṣitaḥ | bhūtaprakṛtimāsthāya sahaiva ca vinaiva ca || 9-7 ||
— इस प्रकार समस्त भावों में ; — मैं अलक्षित होकर विचरता हूँ ; — भूतों की प्रकृति का आश्रय लेकर ; — उनके साथ भी और बिना भी

इस प्रकार मैं समस्त भावों में अलक्षित (अदृश्य) होकर विचरता हूँ, भूतों की प्रकृति का आश्रय लेकर — उनके साथ भी और उनके बिना भी।