एवं हि सर्वभावेषु चराम्यनभिलक्षितः ।
भूतप्रकृतिमास्थाय सहैव च विनैव च ॥
९-७ ॥
evaṃ hi sarvabhāveṣu carāmyanabhilakṣitaḥ |
bhūtaprakṛtimāsthāya sahaiva ca vinaiva ca ||
9-7 ||
इस प्रकार मैं समस्त भावों में अलक्षित (अदृश्य) होकर विचरता हूँ, भूतों की प्रकृति का आश्रय लेकर — उनके साथ भी और उनके बिना भी।