Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.6 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.6

9.6
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ९-६ ॥
yathākāśasthito nityaṃ vāyuḥ sarvatrago mahān | tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya || 9-6 ||
— जैसे नित्य आकाश में स्थित ; — सर्वत्रगामी महान् वायु ; — वैसे ही समस्त भूत ; — मुझमें स्थित — ऐसा समझ

जैसे सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु नित्य आकाश में स्थित रहता है, वैसे ही समस्त भूत मुझमें स्थित हैं — ऐसा समझ।