Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.5 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.5

9.5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ९-५ ॥
na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram | bhūtabhṛnna ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ || 9-5 ||
— और फिर भूत मुझमें स्थित नहीं ; — मेरे ऐश्वर्ययुक्त योग को देख ; — भूतों को धारण करता हुआ, भूतों में स्थित न होता हुआ ; — मेरा आत्मा भूतों को उत्पन्न करने वाला

और फिर भूत मुझमें स्थित नहीं हैं — मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देख! भूतों को धारण करता हुआ और भूतों में स्थित न होता हुआ, मेरा आत्मा भूतों को उत्पन्न करने वाला है।