Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.5 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.5

7.5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ७-५ ॥
apareyamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām | jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat || 7-5 ||
— यह अपरा है; किन्तु इससे भिन्न ; — मेरी परा प्रकृति को जान ; — जीव-स्वरूप, हे महाबाहु ; — जिससे यह जगत् धारण किया जाता है

यह तो मेरी अपरा (निम्न) प्रकृति है; किन्तु हे महाबाहु, इससे भिन्न मेरी दूसरी परा (श्रेष्ठ) प्रकृति को जान, जो जीव-स्वरूप है और जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।