Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.4 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.4

7.4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ७-४ ॥
bhūmirāpo'nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca | ahaṅkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā || 7-4 ||
— पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु ; — आकाश, मन और बुद्धि ; — अहंकार — यह मेरी ; — आठ प्रकार से विभाजित प्रकृति

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — यह मेरी आठ प्रकार से विभाजित प्रकृति है।