Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.4 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.4

6.4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जति । सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ६-४ ॥
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjati | sarvasaṅkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate || 6-4 ||
— जब न इन्द्रियों के विषयों में ; — न कर्मों में आसक्त होता है ; — समस्त संकल्पों का त्यागी ; — तब योगारूढ़ कहलाता है

जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में और न कर्मों में आसक्त होता है, तब समस्त संकल्पों का त्यागी वह योगारूढ़ कहलाता है।