Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.5 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.5

6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ६-५ ॥
uddharedātmanātmānaṃ nātmānamavasādayet | ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ || 6-5 ||
— आत्मा से अपने को ऊपर उठाए ; — अपने को गिराए नहीं ; — क्योंकि आत्मा ही आत्मा का बन्धु ; — आत्मा ही आत्मा का शत्रु

आत्मा के द्वारा अपने को ऊपर उठाए, अपने को गिराए नहीं; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का बन्धु है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है।