स एष कलुषी क्षुद्रश्छिद्रप्रेक्षी धनञ्जय ।
रजःप्रवृत्तो मोहात्मा मनुष्याणामुपद्रवः ॥
३-४२ ॥
sa eṣa kaluṣī kṣudraśchidraprekṣī dhanañjaya |
rajaḥpravṛtto mohātmā manuṣyāṇāmupadravaḥ ||
3-42 ||
हे धनञ्जय, यह कलुषित और तुच्छ, छिद्र (दुर्बलता) ढूँढ़ने वाला, रजोगुण से प्रवृत्त और मोह-स्वरूप शत्रु मनुष्यों का उपद्रव (विपत्ति) है।