Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.42 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.42

3.42
स एष कलुषी क्षुद्रश्छिद्रप्रेक्षी धनञ्जय । रजःप्रवृत्तो मोहात्मा मनुष्याणामुपद्रवः ॥ ३-४२ ॥
sa eṣa kaluṣī kṣudraśchidraprekṣī dhanañjaya | rajaḥpravṛtto mohātmā manuṣyāṇāmupadravaḥ || 3-42 ||
— वही यह कलुषित और तुच्छ ; — छिद्र (दुर्बलता) ढूँढ़ने वाला ; — हे धनञ्जय ; — रजोगुण से प्रवृत्त, मोह-स्वरूप ; — मनुष्यों का उपद्रव

हे धनञ्जय, यह कलुषित और तुच्छ, छिद्र (दुर्बलता) ढूँढ़ने वाला, रजोगुण से प्रवृत्त और मोह-स्वरूप शत्रु मनुष्यों का उपद्रव (विपत्ति) है।