हर्षमस्य निवर्त्यैष शोकमस्य ददाति च ।
भयं चास्य करोत्येष मोहयंस्तु मुहुर्मुहुः ॥
३-४१ ॥
harṣamasya nivartyaiṣa śokamasya dadāti ca |
bhayaṃ cāsya karotyeṣa mohayaṃstu muhurmuhuḥ ||
3-41 ||
यह शत्रु उसके हर्ष को छीन लेता है और उसे शोक देता है; और बार-बार मोहित करता हुआ इसमें भय भी उत्पन्न करता है।