Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.41 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.41

3.41
हर्षमस्य निवर्त्यैष शोकमस्य ददाति च । भयं चास्य करोत्येष मोहयंस्तु मुहुर्मुहुः ॥ ३-४१ ॥
harṣamasya nivartyaiṣa śokamasya dadāti ca | bhayaṃ cāsya karotyeṣa mohayaṃstu muhurmuhuḥ || 3-41 ||
— इसके हर्ष को छीनकर यह ; — और इसे शोक देता है ; — और इसमें भय भी उत्पन्न करता है ; — बार-बार मोहित करता हुआ

यह शत्रु उसके हर्ष को छीन लेता है और उसे शोक देता है; और बार-बार मोहित करता हुआ इसमें भय भी उत्पन्न करता है।