एष सूक्ष्मः परः शत्रुर्देहिनामिन्द्रियैः सह ।
सुखतन्त्र इवासीनो मोहयन्पार्थ तिष्ठति ॥
३-३९ ॥
eṣa sūkṣmaḥ paraḥ śatrurdehināmindriyaiḥ saha |
sukhatantra ivāsīno mohayanpārtha tiṣṭhati ||
3-39 ||
हे पार्थ, यह सूक्ष्म और परम शत्रु देहधारियों की इन्द्रियों के साथ रहता है; सुख में रत-सा बैठकर वह उन्हें मोहित करता हुआ स्थित रहता है।