Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.38 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.38

3.38
भवत्येष कथं कृष्ण कथं चैव विवर्धते । किमात्मकः किमाचारस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ३-३८ ॥
bhavatyeṣa kathaṃ kṛṣṇa kathaṃ caiva vivardhate | kimātmakaḥ kimācārastanmamācakṣva pṛcchataḥ || 3-38 ||
— यह कैसे उत्पन्न होता है, हे कृष्ण ; — और कैसे बढ़ता है ; — इसका स्वरूप क्या, आचार क्या ; — यह मुझ पूछने वाले को बताइए

हे कृष्ण, यह काम कैसे उत्पन्न होता है और कैसे बढ़ता है? इसका स्वरूप क्या है और इसका व्यवहार क्या है? यह मुझ पूछने वाले को बताइए।