भवत्येष कथं कृष्ण कथं चैव विवर्धते ।
किमात्मकः किमाचारस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥
३-३८ ॥
bhavatyeṣa kathaṃ kṛṣṇa kathaṃ caiva vivardhate |
kimātmakaḥ kimācārastanmamācakṣva pṛcchataḥ ||
3-38 ||
हे कृष्ण, यह काम कैसे उत्पन्न होता है और कैसे बढ़ता है? इसका स्वरूप क्या है और इसका व्यवहार क्या है? यह मुझ पूछने वाले को बताइए।