आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
२-७२ ॥
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ samudramāpaḥ praviśanti yadvat |
tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī ||
2-72 ||
जैसे चारों ओर से भरते रहने पर भी अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में जल प्रवेश करते रहते हैं, वैसे ही जिस पुरुष में समस्त कामनाएँ प्रवेश कर जाती हैं वह शान्ति को प्राप्त करता है, न कि वह जो कामनाओं की कामना करता है।