गुरूनहत्वा हि महानुभावा- ञ्छ्रेयश्चर्तुं भैक्षमपीह लोके ।
न त्वर्थकामस्तु गुरून्निहत्य भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥
२-५ ॥
gurūnahatvā hi mahānubhāvā- ñchreyaścartuṃ bhaikṣamapīha loke |
na tvarthakāmastu gurūnnihatya bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān ||
2-5 ||
इन महानुभाव गुरुओं को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी श्रेयस्कर है; क्योंकि गुरुओं को मारकर तो मैं रक्त से सने हुए भोग ही भोगूँगा।