Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.5 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.5

2.5
गुरूनहत्वा हि महानुभावा- ञ्छ्रेयश्चर्तुं भैक्षमपीह लोके । न त्वर्थकामस्तु गुरून्निहत्य भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ २-५ ॥
gurūnahatvā hi mahānubhāvā- ñchreyaścartuṃ bhaikṣamapīha loke | na tvarthakāmastu gurūnnihatya bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān || 2-5 ||
— क्योंकि गुरुओं को न मारकर ; — महानुभावों को ; — भिक्षा खाना भी श्रेयस्कर ; — इस लोक में ; — किन्तु धन की इच्छा से गुरुओं को मारकर नहीं ; — मैं रक्त से सने भोग भोगूँगा

इन महानुभाव गुरुओं को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी श्रेयस्कर है; क्योंकि गुरुओं को मारकर तो मैं रक्त से सने हुए भोग ही भोगूँगा।