Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.45 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.45

11.45
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य विश्वस्य गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ११-४५ ॥
pitāsi lokasya carācarasya tvamasya viśvasya gururgarīyān | na tvatsamo'styabhyadhikaḥ kuto'nyo lokatraye'pyapratimaprabhāva || 11-45 ||
— आप चराचर जगत् के पिता ; — आप इस विश्व के गुरु और सबसे श्रेष्ठ ; — आपके समान कोई नहीं, फिर बढ़कर अन्य कैसे ; — तीनों लोक में भी, हे अप्रतिम प्रभाव वाले

आप चराचर जगत् के पिता हैं; आप इस विश्व के गुरु और सबसे श्रेष्ठ हैं; हे अप्रतिम प्रभाव वाले, आपके समान कोई नहीं, फिर तीनों लोक में भी आपसे बढ़कर अन्य कैसे हो?