Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.44 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.44

11.44
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ११-४४ ॥
yaccāvahāsārthamasatkṛto'si vihāraśayyāsanabhojaneṣu | eko'thavāpyacyuta tatsamakṣaṃ tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam || 11-44 ||
— और जो हँसी-मजाक में आपका तिरस्कार किया ; — विहार, शय्या, आसन, भोजन के समय ; — अकेले अथवा सबके सामने, हे अच्युत ; — उसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ, हे अप्रमेय

और जो विहार, शय्या, आसन और भोजन के समय, अकेले अथवा सबके सामने, हे अच्युत, हँसी-मजाक के लिए आपका तिरस्कार किया गया — हे अप्रमेय, उसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ।