Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.43 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.43

11.43
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखे च । अजानता महिमानं तवेमं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ११-४३ ॥
sakheti matvā prasabhaṃ yaduktaṃ he kṛṣṇa he yādava he sakhe ca | ajānatā mahimānaṃ tavemaṃ mayā pramādātpraṇayena vāpi || 11-43 ||
— सखा मानकर उतावलेपन में जो कहा ; — 'हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा' ; — आपकी इस महिमा को न जानते हुए मैंने ; — प्रमाद से अथवा प्रेम से भी

आपको सखा मानकर मैंने जो उतावलेपन में कहा — 'हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा' — आपकी इस महिमा को न जानते हुए, प्रमाद से अथवा प्रेम से भी;