Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.42 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.42

11.42
नहि त्वदन्यः कश्चिदपीह देव लोकत्रये दृश्यतेऽचिन्त्यकर्मा । अनन्तवीर्योऽमितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ११-४२ ॥
nahi tvadanyaḥ kaścidapīha deva lokatraye dṛśyate'cintyakarmā | anantavīryo'mitavikramastvaṃ sarvaṃ samāpnoṣi tato'si sarvaḥ || 11-42 ||
— क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई भी यहाँ, हे देव ; — तीनों लोक में नहीं दिखता, अचिन्त्यकर्मा ; — अनन्त वीर्य वाले, अमित पराक्रम वाले आप ; — सब को व्याप्त किए हैं, अतः आप सर्व हैं

हे देव, अचिन्त्यकर्मा आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इस तीनों लोक में नहीं दिखता; अनन्त वीर्य वाले, अमित पराक्रम वाले आप सब को व्याप्त किए हुए हैं, अतः आप सर्व हैं।