The Great Liberation Tantra· 2.16 / 54

The Great Liberation Tantra2.16

2.16
पाञ्चालिका यथा भित्तौ सर्वेन्द्रियसमन्विताः । अमूरशक्ताः कार्येषु तथान्ये मन्त्रराशयः ॥१६॥
pāñcālikā yathā bhittau sarvendriyasamanvitāḥ | amūraśaktāḥ kāryeṣu tathānye mantrarāśayaḥ ||16||
— चित्रित पुतले ; — जैसे ; — भित्ति पर ; — समस्त अंगों से युक्त (दीखते हुए) ; — फिर भी अशक्त, कार्य में असमर्थ ; — कार्यों में ; — वैसे ही अन्य ; — मन्त्र-समूह

जैसे भित्ति पर (चित्रित) पुतले सब अंगों से युक्त होते हुए भी कार्यों में अशक्त होते हैं, वैसे ही (कलियुग में) वे अन्य मन्त्र-समूह हैं।