The Great Liberation Tantra· 2.15 / 54

The Great Liberation Tantra2.15

2.15
निर्वीर्याः श्रौतजातीया विषहीनोरगा इव । सत्यादौ सफला आसन् कलौ ते मृतका इव ॥१५॥
nirvīryāḥ śrautajātīyā viṣahīnoragā iva | satyādau saphalā āsan kalau te mṛtakā iva ||15||
— निर्वीर्य ; — श्रौत वर्ग के ; — विषहीन सर्प ; — के समान ; — सत्य आदि (युगों) में ; — सफल ; — थे ; — कलियुग में ; — वे ; — मृतक के समान ; — मानो

श्रौत वर्ग के मन्त्र विषहीन सर्पों के समान निर्वीर्य हैं; सत्य आदि युगों में सफल रहे, पर कलियुग में वे मृतक के समान हैं।