The Great Liberation Tantra· 1.28 / 72

The Great Liberation Tantra1.28

1.28
नाऽकालमृत्युस्तत्रासीत् न दुर्भिक्षं न वा रुजः । हृष्टाः पुष्टाः सदारोग्यास्तेजोरूपगुणान्विताः । स्त्रियो न व्यभिचारिण्यः पतिभक्तिपरायणः ॥२८॥
nā'kālamṛtyustatrāsīt na durbhikṣaṃ na vā rujaḥ | hṛṣṭāḥ puṣṭāḥ sadārogyāstejorūpaguṇānvitāḥ | striyo na vyabhicāriṇyaḥ patibhaktiparāyaṇaḥ ||28||
— अकाल-मृत्यु नहीं ; — वहाँ ; — थी ; — नहीं ; — दुर्भिक्ष ; — न ; — अथवा ; — रोग ; — हृष्ट ; — पुष्ट ; — सदा निरोग ; — तेज, रूप और गुणों से युक्त ; — स्त्रियाँ ; — नहीं ; — व्यभिचारिणी ; — पति-भक्ति में तत्पर

वहाँ न अकाल-मृत्यु थी, न दुर्भिक्ष, न रोग; लोग हृष्ट, पुष्ट, सदा निरोग, तथा तेज, रूप और गुणों से सम्पन्न थे। स्त्रियाँ व्यभिचारिणी नहीं, अपितु पति-भक्ति में तत्पर थीं।