The Great Liberation Tantra· 1.27 / 72

The Great Liberation Tantra1.27

1.27
भूमयः सर्वशस्याढ्याः पर्ज्जन्याः कालवर्षिणः । गावोऽपि दुग्धसम्पन्नाः पादपाः फलशालिनः ॥२७॥
bhūmayaḥ sarvaśasyāḍhyāḥ parjjanyāḥ kālavarṣiṇaḥ | gāvo'pi dugdhasampannāḥ pādapāḥ phalaśālinaḥ ||27||
— भूमियाँ ; — समस्त अन्न से समृद्ध ; — मेघ ; — समय पर वर्षा करने वाले ; — गौएँ ; — भी ; — दूध से भरपूर ; — वृक्ष ; — फलों से लदे हुए

भूमियाँ सब प्रकार के अन्न से समृद्ध थीं, मेघ समय पर वर्षा करते थे, गौएँ भी दूध से भरपूर थीं, और वृक्ष फलों से लदे रहते थे।