The Great Liberation Tantra· 1.10 / 72

The Great Liberation Tantra1.10

1.10
सर्वेषां हितकर्तारं देवदेवं निरामयम् । प्रसन्नवदनं वीक्ष्य लोकानां हितकाम्यया । विनयावनता देवी पार्वती शिवमब्रवीत् ॥१०॥
sarveṣāṃ hitakartāraṃ devadevaṃ nirāmayam | prasannavadanaṃ vīkṣya lokānāṃ hitakāmyayā | vinayāvanatā devī pārvatī śivamabravīt ||10||
— सबके (हितकर्ता) ; — हितकर्ता को, उपकारक को ; — देवों के देव को ; — निरामय, रोगरहित को ; — प्रसन्न मुख वाले को ; — देखकर ; — लोकों के, प्राणियों के ; — हित की कामना से ; — विनय से अवनत ; — देवी ; — पार्वती ; — शिव से ; — बोली, कहा

सब प्राणियों के हितकर्ता, देवों के देव, निरामय और प्रसन्न मुख वाले उन (सदाशिव) को देखकर, लोकों के हित की कामना से, विनय से अवनत देवी पार्वती ने शिव से कहा।