वदामस्ते किं वा जननि वयमुच्चैर्जडधियो
न धाता नापीशो हरिरपि न ते वेत्ति परमम् ।
तथापि त्वद्भक्तिर्मुखरयति चास्माकममिते
तदेतत्क्षन्तव्यं न खलु पशुरोषः समुचितः ॥९॥
vadāmas te kiṃ vā janani vayam uccair jaḍa-dhiyo |
na dhātā nāpīśo harir api na te vetti paramam |
tathāpi tvad-bhaktir mukharayati cāsmākam amite |
tad etat kṣantavyaṃ na khalu paśu-roṣaḥ samucitaḥ ||9||
हे जननी, हम अत्यन्त जड़बुद्धि तेरे विषय में क्या कह सकते हैं? न ब्रह्मा, न शिव, न विष्णु — कोई भी तेरे परम स्वरूप को नहीं जानता। फिर भी, हे अनन्ते, तुझ पर भक्ति हमें मुखर कर देती है। अतः हमारी इस धृष्टता को क्षमा करना — पशु (बद्ध जीव) पर क्रोध करना तेरे योग्य नहीं है।