Karpūrādi Stotra · 1.9

Karpūrādi Stotra 1.9

1.9
वदामस्ते किं वा जननि वयमुच्चैर्जडधियो न धाता नापीशो हरिरपि न ते वेत्ति परमम् । तथापि त्वद्भक्तिर्मुखरयति चास्माकममिते तदेतत्क्षन्तव्यं न खलु पशुरोषः समुचितः ॥९॥
vadāmas te kiṃ vā janani vayam uccair jaḍa-dhiyo | na dhātā nāpīśo harir api na te vetti paramam | tathāpi tvad-bhaktir mukharayati cāsmākam amite | tad etat kṣantavyaṃ na khalu paśu-roṣaḥ samucitaḥ ||9||
śikhariṇī
— हम कहते हैं ; — तेरे विषय में ; — क्या ; — भला ; — हे जननि ; — हम ; — ऊँचे स्वर में, धृष्टतापूर्वक ; — जड़-बुद्धि वाले ; — न ; — ब्रह्मा (विधाता) ; — न ; — भी ; — ईश (शिव) ; — हरि (विष्णु) ; — भी ; — नहीं ; — तेरा ; — जानता है ; — परम (स्वरूप) ; — फिर भी ; — तेरी भक्ति ; — वाचाल बनाती है ; — और ; — हमको, हमारी ; — हे अमिते (अनन्ते) ; — वह ; — यह ; — क्षमा योग्य ; — नहीं ; — वास्तव में ; — पशु (बद्ध जीव) पर क्रोध ; — उचित

हे जननी, हम अत्यन्त जड़बुद्धि तेरे विषय में क्या कह सकते हैं? न ब्रह्मा, न शिव, न विष्णु — कोई भी तेरे परम स्वरूप को नहीं जानता। फिर भी, हे अनन्ते, तुझ पर भक्ति हमें मुखर कर देती है। अतः हमारी इस धृष्टता को क्षमा करना — पशु (बद्ध जीव) पर क्रोध करना तेरे योग्य नहीं है।