Karpūrādi Stotra · 1.8

Karpūrādi Stotra 1.8

1.8
शिवाभिर्घोराभिः शवनिवहमुण्डास्थिनिकरैः परं संकीर्णायां प्रकटितचितायां हरवधूम् । प्रविष्टां सन्तुष्टामुपरिसुरतेनातियुवतीं सदा त्वां ध्यायन्ति क्वचिदपि च न तेषां परिभवः ॥८॥
śivābhir ghorābhiḥ śava-nivaha-muṇḍāsthi-nikaraiḥ | paraṃ saṃkīrṇāyāṃ prakaṭita-citāyāṃ hara-vadhūm | praviṣṭāṃ santuṣṭām upari-suratenāti-yuvatīṃ | sadā tvāṃ dhyāyanti kvacid api ca na teṣāṃ paribhavaḥ ||8||
śikhariṇī
— शिवाओं (शृगालियों) से ; — घोरा ; — शव-समूह, मुण्ड और अस्थियों के ढेरों से ; — अत्यन्त ; — भरी हुई, सघन ; — प्रज्वलित चिता पर ; — हर की वधू ; — प्रवेश की हुई ; — संतुष्ट ; — ऊपर से सुरत-क्रिया द्वारा ; — नित्य-तरुणी ; — सदा ; — तेरा ; — ध्यान करते हैं ; — कहीं ; — भी ; — और ; — नहीं ; — उनका ; — पराजय, अपमान

जो साधक सदा तेरा ध्यान करते हैं — हर की वधू, अपने प्रियतम के ऊपर सुरत-सुख से सन्तुष्ट, नित्य-यौवना तू, जो शवों के ढेरों, खोपड़ियों, हड्डियों और भयानक शृगालियों से भरे श्मशान में जलती चिता पर आरूढ़ है — वे कहीं भी पराजय का सामना नहीं करते।