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Karpūrādi Stotra· 1.7 / 22

Karpūrādi Stotra1.7

1.7
गतासूनां बाहुप्रकरकृतकाञ्चीपरिलसन्नितम्बां दिग्वस्त्रां त्रिभुवनविधात्रीं त्रिणयनाम् । श्मशानस्थे तल्पे शवहृदि महाकालसुरतप्रयुक्तां त्वां ध्यायन् जननि जडचेता अपि कविः ॥७॥
gatāsūnāṃ bāhu-prakara-kṛta-kāñcī-parilasan-nitambāṃ | dig-vastrāṃ tribhuvana-vidhātrīṃ tri-nayanām | śmaśāna-sthe talpe śava-hṛdi mahākāla-surata-prayuktāṃ | tvāṃ dhyāyañ janani jaḍa-cetā api kaviḥ ||7||
śikhariṇī
— मरे हुओं (की भुजाओं) की ; — जिनके नितम्ब असंख्य भुजाओं की करधनी से दीप्त हैं ; — दिशा-वस्त्रा (दिगम्बरा, नग्न) ; — तीनों लोकों की विधात्री ; — त्रिनयना ; — श्मशान में स्थित (शय्या पर) ; — शय्या पर ; — शव के हृदय पर ; — महाकाल के साथ सुरत में संलग्ना ; — तेरा ; — ध्यान करता हुआ ; — हे जननि ; — जड़-बुद्धि ; — भी ; — कवि (बन जाता है)

हे जननी! तेरे नितम्ब वध किए हुए शत्रुओं की भुजाओं की करधनी से शोभायमान हैं, तू दिगम्बरा है, तीनों लोकों की विधात्री और त्रिनयना है। श्मशान में बिछी हुई शय्या पर शव के हृदय पर तू महाकाल के साथ रति-क्रीड़ा में लीन है। ऐसी तेरा ध्यान करते हुए जड़बुद्धि मनुष्य भी कवि बन जाता है।