प्रत्येकं वा द्वयं वा त्रयमपि च परं बीजमत्यन्तगुह्यं
त्वन्नाम्ना योजयित्वा सकलमपि सदा भावयन्तो जपन्ति ।
तेषां नेत्रारविन्दे विहरति कमला वक्त्रशुभ्रांशुबिम्बे
वाग्देवी देवि मुण्डस्रगतिशयलसत्कण्ठि पीनस्तनाढ्ये ॥६॥
pratyekaṃ vā dvayaṃ vā trayam api ca paraṃ bījam atyanta-guhyaṃ |
tvan-nāmnā yojayitvā sakalam api sadā bhāvayanto japanti |
teṣāṃ netrāravinde viharati kamalā vaktra-śubhrāṃśu-bimbe |
vāg-devī devi muṇḍa-srag-atiśaya-lasat-kaṇṭhi pīna-stanāḍhye ||6||
sragdharā
हे देवि, हे मुण्डमाला से सुशोभित कण्ठ वाली, हे पीन-स्तना! जो साधक तेरे परम गुह्य बीज-अक्षरों को — एक-एक करके, दो-दो करके, या तीन-तीन करके — तेरे नाम के साथ जोड़कर, सम्पूर्ण रूप का सदा ध्यान करते हुए जपते हैं, उनके कमल-नेत्रों में लक्ष्मी विहार करती हैं और उनके चन्द्रमा-समान उज्ज्वल मुख में वाग्देवी सरस्वती निवास करती हैं।