Karpūrādi Stotra · 1.6

Karpūrādi Stotra 1.6

1.6
प्रत्येकं वा द्वयं वा त्रयमपि च परं बीजमत्यन्तगुह्यं त्वन्नाम्ना योजयित्वा सकलमपि सदा भावयन्तो जपन्ति । तेषां नेत्रारविन्दे विहरति कमला वक्त्रशुभ्रांशुबिम्बे वाग्देवी देवि मुण्डस्रगतिशयलसत्कण्ठि पीनस्तनाढ्ये ॥६॥
pratyekaṃ vā dvayaṃ vā trayam api ca paraṃ bījam atyanta-guhyaṃ | tvan-nāmnā yojayitvā sakalam api sadā bhāvayanto japanti | teṣāṃ netrāravinde viharati kamalā vaktra-śubhrāṃśu-bimbe | vāg-devī devi muṇḍa-srag-atiśaya-lasat-kaṇṭhi pīna-stanāḍhye ||6||
sragdharā
— एक-एक करके ; — अथवा ; — युगल ; — अथवा ; — त्रिक ; — भी ; — और ; — परम ; — बीज-मन्त्र ; — अत्यन्त गुह्य ; — तेरे नाम के साथ ; — जोड़कर ; — सम्पूर्ण ; — भी ; — सदा ; — ध्यान करते हुए ; — जपते हैं ; — उनके ; — नेत्र-कमल में ; — विहार करती है ; — कमला (लक्ष्मी) ; — मुख के उज्ज्वल चन्द्र-बिम्ब में ; — वाग्देवी (सरस्वती) ; — हे देवी ; — हे मुण्ड-माला से अति दीप्त कण्ठ वाली ; — हे पुष्ट-स्तनों से समृद्ध

हे देवि, हे मुण्डमाला से सुशोभित कण्ठ वाली, हे पीन-स्तना! जो साधक तेरे परम गुह्य बीज-अक्षरों को — एक-एक करके, दो-दो करके, या तीन-तीन करके — तेरे नाम के साथ जोड़कर, सम्पूर्ण रूप का सदा ध्यान करते हुए जपते हैं, उनके कमल-नेत्रों में लक्ष्मी विहार करती हैं और उनके चन्द्रमा-समान उज्ज्वल मुख में वाग्देवी सरस्वती निवास करती हैं।