समन्तादापीनस्तनजघनधृग्यौवनवती-
रतासक्तो नक्तं यदि जपति भक्तस्तव मनुम् ।
विवासास्त्वां ध्यायन् गलितचिकुरस्तस्य वशगाः
समस्ताः सिद्धौघा भुवि चिरतरं जीवति कविः ॥१०॥
samantād āpīna-stana-jaghana-dhṛg-yauvanavatī-|
ratāsakto naktaṃ yadi japati bhaktas tava manum |
vivāsās tvāṃ dhyāyan galita-cikuras tasya vaśa-gāḥ |
samastāḥ siddhaughā bhuvi cirataraṃ jīvati kaviḥ ||10||
śikhariṇī
यदि कोई भक्त रात्रि में, वस्त्रहीन और बिखरे केशों के साथ, पीन-स्तनी और पुष्ट जघन वाली युवती के साथ रति में आसक्त होकर भी तेरा ध्यान करते हुए तेरा मन्त्र जपे, तो समस्त सिद्धि-समूह उसके वशवर्ती हो जाते हैं और वह कवि बनकर पृथ्वी पर बहुत लम्बे समय तक जीवित रहता है।