Karpūrādi Stotra · 1.10

Karpūrādi Stotra 1.10

1.10
समन्तादापीनस्तनजघनधृग्यौवनवती- रतासक्तो नक्तं यदि जपति भक्तस्तव मनुम् । विवासास्त्वां ध्यायन् गलितचिकुरस्तस्य वशगाः समस्ताः सिद्धौघा भुवि चिरतरं जीवति कविः ॥१०॥
samantād āpīna-stana-jaghana-dhṛg-yauvanavatī-| ratāsakto naktaṃ yadi japati bhaktas tava manum | vivāsās tvāṃ dhyāyan galita-cikuras tasya vaśa-gāḥ | samastāḥ siddhaughā bhuvi cirataraṃ jīvati kaviḥ ||10||
śikhariṇī
— सब ओर से ; — पुष्ट स्तन व जघन धारक यौवनवती के साथ रति में आसक्त ; — रात्रि में ; — यदि ; — जपता है ; — भक्त ; — तेरा ; — मन्त्र ; — नग्न, वस्त्र-रहित ; — तेरा ; — ध्यान करता हुआ ; — खुले केशों वाला ; — उसकी ; — वशवर्ती ; — सब की सब ; — सिद्धियों के समूह ; — पृथ्वी पर ; — बहुत लम्बा ; — जीता है ; — कवि के रूप में

यदि कोई भक्त रात्रि में, वस्त्रहीन और बिखरे केशों के साथ, पीन-स्तनी और पुष्ट जघन वाली युवती के साथ रति में आसक्त होकर भी तेरा ध्यान करते हुए तेरा मन्त्र जपे, तो समस्त सिद्धि-समूह उसके वशवर्ती हो जाते हैं और वह कवि बनकर पृथ्वी पर बहुत लम्बे समय तक जीवित रहता है।