Karpūrādi Stotra · 1.11

Karpūrādi Stotra 1.11

1.11
समाः सुस्थीभूतो जपति विपरीतां यदि सदा विचिन्त्य त्वां ध्यायन्नतिशयमहाकालसुरताम् । तदा तस्य क्षोणीतलविहरमाणस्य विदुषः कराम्भोजे वश्या पुरहरवधू सिद्धिनिवहाः ॥११॥
samāḥ susthī-bhūto japati viparītāṃ yadi sadā | vicintya tvāṃ dhyāyann atiśaya-mahākāla-suratām | tadā tasya kṣoṇī-tala-viharamāṇasya viduṣaḥ | karāmbhoje vaśyā purahara-vadhū siddhi-nivahāḥ ||11||
śikhariṇī
— वर्षों तक ; — स्वस्थ-चित्त, सुस्थिर ; — जपता है ; — विपरीत (विपरीत-रति की मुद्रा में) ; — यदि ; — सदा ; — चिन्तन करके ; — तेरा ; — ध्यान करता हुआ ; — महाकाल के साथ अति-उत्कट सुरत में लीन ; — तब ; — उसके लिए ; — पृथ्वी-तल पर विहार करते हुए ; — विद्वान् के ; — कर-कमल में ; — वशीभूत ; — पुरारि (शिव) की वधू ; — और सिद्धियों के समूह

यदि कोई विद्वान् साधक वर्षों तक स्थिरचित्त होकर तेरा ध्यान करता रहे — विशेषतः विपरीत-रति में महाकाल के साथ अत्यन्त लीन तेरा चिन्तन करते हुए — और तेरा मन्त्र जपता रहे, तो इस पृथ्वी पर विचरते हुए उसके कर-कमल में पुरारि शिव की वधू तू स्वयं तथा सिद्धियों के समूह वश में हो जाते हैं।