समाः सुस्थीभूतो जपति विपरीतां यदि सदा
विचिन्त्य त्वां ध्यायन्नतिशयमहाकालसुरताम् ।
तदा तस्य क्षोणीतलविहरमाणस्य विदुषः
कराम्भोजे वश्या पुरहरवधू सिद्धिनिवहाः ॥११॥
samāḥ susthī-bhūto japati viparītāṃ yadi sadā |
vicintya tvāṃ dhyāyann atiśaya-mahākāla-suratām |
tadā tasya kṣoṇī-tala-viharamāṇasya viduṣaḥ |
karāmbhoje vaśyā purahara-vadhū siddhi-nivahāḥ ||11||
śikhariṇī
यदि कोई विद्वान् साधक वर्षों तक स्थिरचित्त होकर तेरा ध्यान करता रहे — विशेषतः विपरीत-रति में महाकाल के साथ अत्यन्त लीन तेरा चिन्तन करते हुए — और तेरा मन्त्र जपता रहे, तो इस पृथ्वी पर विचरते हुए उसके कर-कमल में पुरारि शिव की वधू तू स्वयं तथा सिद्धियों के समूह वश में हो जाते हैं।