प्रसूते संसारं जननि भवती पालयति च
समस्तं क्षित्यादि प्रलयसमये संहरति च ।
अतस्त्वं धात्रीसि त्रिभुवनपतिः श्रीपतिरपि
महेशोऽपि प्रायः सकलमपि किं स्तौमि भवतीम् ॥१२॥
prasūte saṃsāraṃ janani bhavatī pālayati ca |
samastaṃ kṣity-ādi pralaya-samaye saṃharati ca |
atas tvaṃ dhātrī si tribhuvana-patiḥ śrī-patir api |
maheśo 'pi prāyaḥ sakalam api kiṃ staumi bhavatīm ||12||
śikhariṇī
हे जननी, तू ही संसार को जन्म देती है, उसका पालन करती है, और प्रलय-काल में पृथ्वी आदि समस्त जगत् को अपने में समेट लेती है। अतः तू ही धात्री (सृष्टिकर्त्री ब्रह्मा), तू ही त्रिभुवनपति (विष्णु), तू ही श्रीपति, और तू ही महेश है — प्रायः तू ही सब कुछ है। मैं तेरी क्या स्तुति करूँ?