Karpūrādi Stotra · 1.12

Karpūrādi Stotra 1.12

1.12
प्रसूते संसारं जननि भवती पालयति च समस्तं क्षित्यादि प्रलयसमये संहरति च । अतस्त्वं धात्रीसि त्रिभुवनपतिः श्रीपतिरपि महेशोऽपि प्रायः सकलमपि किं स्तौमि भवतीम् ॥१२॥
prasūte saṃsāraṃ janani bhavatī pālayati ca | samastaṃ kṣity-ādi pralaya-samaye saṃharati ca | atas tvaṃ dhātrī si tribhuvana-patiḥ śrī-patir api | maheśo 'pi prāyaḥ sakalam api kiṃ staumi bhavatīm ||12||
śikhariṇī
— उत्पन्न करती है ; — संसार को ; — हे जननि ; — तू (आदरार्थ) ; — पालन करती है ; — और ; — सम्पूर्ण को ; — पृथ्वी आदि ; — प्रलय के समय ; — संहार करती है ; — और ; — इसलिए ; — तू ; — धात्री (विधात्री) ; — है ; — त्रिभुवनपति ; — श्रीपति (विष्णु) ; — भी ; — महेश (शिव) ; — भी ; — प्रायः ; — सब कुछ ; — भी ; — कैसे ; — स्तुति करूँ ; — तेरी (आदरार्थ)

हे जननी, तू ही संसार को जन्म देती है, उसका पालन करती है, और प्रलय-काल में पृथ्वी आदि समस्त जगत् को अपने में समेट लेती है। अतः तू ही धात्री (सृष्टिकर्त्री ब्रह्मा), तू ही त्रिभुवनपति (विष्णु), तू ही श्रीपति, और तू ही महेश है — प्रायः तू ही सब कुछ है। मैं तेरी क्या स्तुति करूँ?