Karpūrādi Stotra · 1.13

Karpūrādi Stotra 1.13

1.13
अनेके सेवन्ते भवदधिगिर्वाणनिवहान् विमूढास्ते मातः किमपि न हि जानन्ति परमम् । समाराध्यामाद्यां हरिहरविरिञ्चादिविबुधैः प्रपन्नोऽस्मि स्वैरं रतिरससमहानन्दनिरताम् ॥१३॥
aneke sevante bhavad-adhi-girvāṇa-nivahān | vimūḍhās te mātaḥ kim api na hi jānanti paramam | samārādhyām ādyāṃ hari-hara-viriñcādi-vibudhaiḥ | prapanno 'smi svairaṃ rati-rasa-sa-mahānanda-niratām ||13||
śikhariṇī
— अनेक ; — सेवा करते हैं ; — तेरे अधीन देव-समूहों की ; — अति-मूढ़ ; — वे ; — हे माता ; — कुछ भी ; — नहीं ; — वास्तव में ; — जानते हैं ; — परम ; — जो सम्यक् आराध्या है ; — आदि-शक्ति ; — हरि, हर, विरिञ्चि आदि विबुधों द्वारा ; — शरणागत ; — मैं हूँ ; — स्वच्छन्द ; — रति-रस और महानन्द में लीन

हे माता, अनेक लोग तुझसे नीचे के देव-समूहों की उपासना करते हैं — वे विमूढ़ परम तत्त्व को कुछ भी नहीं जानते। मैं तो स्वच्छन्द रूप से तेरी ही शरण में आया हूँ — तू जो हरि, हर, ब्रह्मा आदि सभी देवों द्वारा पूजनीय आद्या है, और रति-रस के महानन्द में सदा निरत रहती है।