अनेके सेवन्ते भवदधिगिर्वाणनिवहान्
विमूढास्ते मातः किमपि न हि जानन्ति परमम् ।
समाराध्यामाद्यां हरिहरविरिञ्चादिविबुधैः
प्रपन्नोऽस्मि स्वैरं रतिरससमहानन्दनिरताम् ॥१३॥
aneke sevante bhavad-adhi-girvāṇa-nivahān |
vimūḍhās te mātaḥ kim api na hi jānanti paramam |
samārādhyām ādyāṃ hari-hara-viriñcādi-vibudhaiḥ |
prapanno 'smi svairaṃ rati-rasa-sa-mahānanda-niratām ||13||
śikhariṇī
हे माता, अनेक लोग तुझसे नीचे के देव-समूहों की उपासना करते हैं — वे विमूढ़ परम तत्त्व को कुछ भी नहीं जानते। मैं तो स्वच्छन्द रूप से तेरी ही शरण में आया हूँ — तू जो हरि, हर, ब्रह्मा आदि सभी देवों द्वारा पूजनीय आद्या है, और रति-रस के महानन्द में सदा निरत रहती है।