Karpūrādi Stotra · 1.14

Karpūrādi Stotra 1.14

1.14
धरित्री कीलालं शुचिरपि समीरोऽपि गगनं त्वमेका कल्याणी गिरिशरमणी कालि सकलम् । प्रसन्ना त्वं भूया भवमनु न भूयान्मम जनुः ॥१४॥
dharitrī kīlālaṃ śucir api samīro 'pi gaganaṃ | tvam ekā kalyāṇī giri-śa-ramaṇī kāli sakalam | prasannā tvaṃ bhūyā bhavam anu na bhūyān mama januḥ ||14||
śikhariṇī
— धरित्री (पृथ्वी) ; — जल ; — अग्नि (शुचि) ; — भी ; — वायु ; — भी ; — आकाश, गगन ; — तू एक ही ; — कल्याणी ; — गिरीश (शिव) की प्रिया ; — हे काली ; — सब कुछ ; — प्रसन्न ; — तू ; — हो ; — इस जन्म के बाद ; — न ; — हो ; — मेरा ; — जन्म

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — हे काली, हे गिरीश-प्रिये, हे कल्याणी! तू ही अकेली यह सब कुछ है। तू मुझ पर प्रसन्न हो, और अब इस संसार में मेरा पुनर्जन्म न हो।