धरित्री कीलालं शुचिरपि समीरोऽपि गगनं
त्वमेका कल्याणी गिरिशरमणी कालि सकलम् ।
प्रसन्ना त्वं भूया भवमनु न भूयान्मम जनुः ॥१४॥
dharitrī kīlālaṃ śucir api samīro 'pi gaganaṃ |
tvam ekā kalyāṇī giri-śa-ramaṇī kāli sakalam |
prasannā tvaṃ bhūyā bhavam anu na bhūyān mama januḥ ||14||
śikhariṇī
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — हे काली, हे गिरीश-प्रिये, हे कल्याणी! तू ही अकेली यह सब कुछ है। तू मुझ पर प्रसन्न हो, और अब इस संसार में मेरा पुनर्जन्म न हो।