Karpūrādi Stotra · 1.15

Karpūrādi Stotra 1.15

1.15
श्मशानस्थः सुस्थो गलितचिकुरो दिक्पटधरः सहस्रं त्वर्कार्णां निजगलितवीर्येण कुसुमम् । जपंस्त्वत्प्रत्येकं मनुमपि तव ध्याननिरतो महाकालि स्वैरं स भवति धरित्रीपरिवृढः ॥१५॥
śmaśāna-sthaḥ sustho galita-cikuro dik-paṭa-dharaḥ | sahasraṃ tv arkārṇāṃ nija-galita-vīryeṇa kusumam | japaṃs tvat-pratyekaṃ manum api tava dhyāna-nirato | mahākāli svairaṃ sa bhavati dharitrī-parivṛḍhaḥ ||15||
śikhariṇī
— श्मशान में स्थित ; — सुस्थ, स्थिर-चित्त ; — खुले केशों वाला ; — दिक्-पट (दिशा-वस्त्र, नग्न) ; — एक हज़ार ; — तो ; — अर्क (मदार) पुष्पों का ; — अपने स्खलित वीर्य से ; — पुष्प (अर्पण) ; — जपता हुआ ; — तेरे प्रत्येक (अक्षर) ; — मन्त्र ; — भी ; — तेरा ; — ध्यान में लीन ; — हे महाकाली ; — स्वच्छन्द ; — वह ; — हो जाता है ; — पृथ्वी का स्वामी

हे महाकाली! जो साधक श्मशान में स्थिरचित्त होकर, बिखरे केशों और दिगम्बर रूप में, अपने स्खलित वीर्य से लिप्त एक सहस्र अर्क-पुष्प तुझे अर्पित करता है, और तेरा ध्यान करते हुए तेरे एक-एक मन्त्र-अक्षर का जप करता है, वह स्वच्छन्द भाव से पृथ्वी का स्वामी बन जाता है।