श्मशानस्थः सुस्थो गलितचिकुरो दिक्पटधरः
सहस्रं त्वर्कार्णां निजगलितवीर्येण कुसुमम् ।
जपंस्त्वत्प्रत्येकं मनुमपि तव ध्याननिरतो
महाकालि स्वैरं स भवति धरित्रीपरिवृढः ॥१५॥
śmaśāna-sthaḥ sustho galita-cikuro dik-paṭa-dharaḥ |
sahasraṃ tv arkārṇāṃ nija-galita-vīryeṇa kusumam |
japaṃs tvat-pratyekaṃ manum api tava dhyāna-nirato |
mahākāli svairaṃ sa bhavati dharitrī-parivṛḍhaḥ ||15||
śikhariṇī
हे महाकाली! जो साधक श्मशान में स्थिरचित्त होकर, बिखरे केशों और दिगम्बर रूप में, अपने स्खलित वीर्य से लिप्त एक सहस्र अर्क-पुष्प तुझे अर्पित करता है, और तेरा ध्यान करते हुए तेरे एक-एक मन्त्र-अक्षर का जप करता है, वह स्वच्छन्द भाव से पृथ्वी का स्वामी बन जाता है।