Karpūrādi Stotra · 1.16

Karpūrādi Stotra 1.16

1.16
गृहे सम्मार्ज्यन्या परिगलितवीर्यं हि चिकुरं समूलं मध्याह्ने वितरति चितायां कुजदिने । समुच्चार्य प्रेम्णा मनुमपि सकृत्कालि सततं गजारूढो याति क्षितिपरिवृढः सत्कविवरः ॥१६॥
gṛhe sammārjyanyā parigalita-vīryaṃ hi cikuraṃ | samūlaṃ madhyāhne vitarati citāyāṃ kuja-dine | samuccārya premṇā manum api sakṛt kāli satataṃ | gajārūḍho yāti kṣiti-parivṛḍhaḥ sat-kavi-varaḥ ||16||
śikhariṇī
— घर में ; — झाडू़ की कूड़े-सी राख से ; — स्खलित वीर्य से युक्त ; — ही ; — केश ; — जड़ सहित ; — दोपहर में ; — अर्पित करता है ; — चिता पर ; — मंगलवार के दिन ; — उच्चारण करके ; — प्रेम से ; — मन्त्र ; — भी ; — एक बार ; — हे काली ; — निरन्तर ; — हाथी पर सवार ; — हो जाता है ; — पृथ्वी का स्वामी ; — श्रेष्ठ सत्कवियों में अग्रणी

हे कालि! जो साधक मंगलवार के दिन, मध्याह्न के समय, श्मशान की चिता पर अपने झड़े हुए केश सहित मूल को और स्खलित वीर्य को अर्पित कर के, प्रेम-पूर्वक एक बार भी तेरा मन्त्र उच्चारण करता है, वह सत्कवियों में अग्रगण्य होकर हाथी पर सवार पृथ्वी का स्वामी बन जाता है।