स्वपुष्पैराकीर्णं कुसुमधनुषो मन्दिरमहो
पुरो ध्यायन्ध्यायन् यदि जपति भक्तस्तव मनुम् ।
स गन्धर्वश्रेणीपतिरपि कवित्वामृतनदी-
नदीनः पर्यन्ते परमपदलीनः प्रभवति ॥१७॥
sva-puṣpair ākīrṇaṃ kusuma-dhanuṣo mandiram aho |
puro dhyāyan-dhyāyan yadi japati bhaktas tava manum |
sa gandharva-śreṇī-patir api kavitvāmṛta-nadī-|
nadīnaḥ paryante parama-pada-līnaḥ prabhavati ||17||
śikhariṇī
यदि कोई भक्त कामदेव (पुष्प-धनुर्धर) के मन्दिर में, जो उसके अपने पुष्पों से आकीर्ण है, बार-बार ध्यान करते हुए तेरा मन्त्र जपे, तो वह गन्धर्व-गणों का स्वामी और काव्य-अमृत की अविच्छिन्न नदी बन जाता है, और अन्त में परम पद में लीन हो जाता है।