त्रिपञ्चारे पीठे शवशिवहृदि स्मेरवदनां
महाकालेनोच्चैर्मदनरसलावण्यनिरताम् ।
समासक्तो नक्तं स्वयमपि रतानन्दनिरतो
जनो यो ध्यायेत्त्वामयि जननि स स्यात् स्मरहरः ॥१८॥
tri-pañcāre pīṭhe śava-śiva-hṛdi smera-vadanāṃ |
mahākālenoccair madana-rasa-lāvaṇya-niratām |
samāsakto naktaṃ svayam api ratānanda-nirato |
jano yo dhyāyet tvām ayi janani sa syāt smara-haraḥ ||18||
śikhariṇī
हे जननी! जो मनुष्य रात्रि में स्वयं भी रति-आनन्द में लीन होकर, तेरा ध्यान करता है — तू जो पन्द्रह-अरों वाले श्रीचक्र-पीठ पर शव-रूप शिव के हृदय पर विराजमान है, मुसकुराते मुख वाली, महाकाल के साथ मदन-रस और लावण्य में अत्यन्त निरत है — वह स्वयं स्मरहर (शिव) के समान हो जाता है।