Karpūrādi Stotra · 1.18

Karpūrādi Stotra 1.18

1.18
त्रिपञ्चारे पीठे शवशिवहृदि स्मेरवदनां महाकालेनोच्चैर्मदनरसलावण्यनिरताम् । समासक्तो नक्तं स्वयमपि रतानन्दनिरतो जनो यो ध्यायेत्त्वामयि जननि स स्यात् स्मरहरः ॥१८॥
tri-pañcāre pīṭhe śava-śiva-hṛdi smera-vadanāṃ | mahākālenoccair madana-rasa-lāvaṇya-niratām | samāsakto naktaṃ svayam api ratānanda-nirato | jano yo dhyāyet tvām ayi janani sa syāt smara-haraḥ ||18||
śikhariṇī
— पन्द्रह-आरों वाले ; — पीठ पर ; — शव-रूपी शिव के हृदय पर ; — स्मित-मुखी ; — महाकाल के द्वारा ; — तीव्रता से ; — मदन के रस-लावण्य में निरत ; — अत्यन्त आसक्त ; — रात्रि में ; — स्वयं ; — भी ; — रति-आनन्द में लीन ; — मनुष्य ; — जो ; — ध्यान करे ; — तेरा ; — अरी! ; — हे जननि ; — वह ; — हो जाये ; — स्मर-हर (साक्षात् शिव)

हे जननी! जो मनुष्य रात्रि में स्वयं भी रति-आनन्द में लीन होकर, तेरा ध्यान करता है — तू जो पन्द्रह-अरों वाले श्रीचक्र-पीठ पर शव-रूप शिव के हृदय पर विराजमान है, मुसकुराते मुख वाली, महाकाल के साथ मदन-रस और लावण्य में अत्यन्त निरत है — वह स्वयं स्मरहर (शिव) के समान हो जाता है।