Karpūrādi Stotra · 1.19

Karpūrādi Stotra 1.19

1.19
सलोमास्थि स्वैरं पललमपि मार्जारमसिते परं चोष्ट्रं मैषं नरमहिषयोश्छागमपि वा । बलिं ते पूजायामयि वितरतां मर्त्यवसतां सतां सिद्धिः सर्वा प्रतिपदमपूर्वा प्रभवति ॥१९॥
sa-lomāsthi svairaṃ palalam api mārjāram asite | paraṃ coṣṭraṃ maiṣaṃ nara-mahiṣayoś chāgam api vā | baliṃ te pūjāyām ayi vitaratāṃ martya-vasatāṃ | satāṃ siddhiḥ sarvā pratipadam apūrvā prabhavati ||19||
śikhariṇī
— रोम-अस्थि सहित ; — स्वच्छन्द ; — मांस ; — भी ; — बिलाव (बिल्ली) का ; — हे असिते (काली) ; — इसके अतिरिक्त ; — और ; — ऊँट का ; — भेड़ का ; — मनुष्य और भैंसे का ; — बकरे का ; — भी ; — अथवा ; — बलि ; — तेरे लिए ; — पूजा में ; — अरी! ; — अर्पण करने वालों की ; — मर्त्यलोक में रहने वाले ; — सज्जनों की ; — सिद्धि ; — सब ; — प्रति-पद, हर कदम पर ; — अपूर्व ; — उत्पन्न होती है

हे असिते (श्याम वर्ण वाली)! जो लोग संसार में रहते हुए तेरी पूजा में बिल्ली, ऊँट, भेड़, मनुष्य, भैंस, अथवा बकरे का — रोम और हड्डियों सहित मांस — स्वच्छन्द रूप से बलि के रूप में अर्पित करते हैं, उन सत्पुरुषों को प्रत्येक पद पर अपूर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।