Karpūrādi Stotra · 1.20

Karpūrādi Stotra 1.20

1.20
वशी लक्षं मन्त्रं प्रजपति हविष्याशनरतो दिवा मातर्युष्मच्चरणयुगलध्याननिपुणः । परं नक्तं नग्नो निधुवनविनोदेन च मनुं जपेल्लक्षं स स्यात् स्मरहरसमानः क्षितितले ॥२०॥
vaśī lakṣaṃ mantraṃ prajapati haviṣyāśana-rato | divā mātar yuṣmac-caraṇa-yugala-dhyāna-nipuṇaḥ | paraṃ naktaṃ nagno nidhuvana-vinodena ca manuṃ | japel lakṣaṃ sa syāt smara-hara-samānaḥ kṣiti-tale ||20||
śikhariṇī
— जितेन्द्रिय ; — एक लाख ; — (बार) मन्त्र ; — जपता है ; — हवि (यज्ञ-शेष) भोजन में रत ; — दिन में ; — हे माता ; — तेरे चरण-युगल के ध्यान में निपुण ; — इसके अतिरिक्त ; — रात्रि में ; — नग्न ; — निधुवन (रति-क्रीडा) के विनोद से ; — और ; — मन्त्र ; — जपे ; — एक लाख (बार) ; — वह ; — हो जाता है ; — स्मर-हर (शिव) के समान ; — पृथ्वी-तल पर

हे माता! जो जितेन्द्रिय साधक हविष्यान्न पर रहकर, दिन में तेरे दोनों चरण-कमलों के ध्यान में निपुण होकर एक लाख बार तेरा मन्त्र जपता है, और फिर रात्रि में नग्न होकर रति-क्रीड़ा के विनोद के साथ एक लाख बार जपता है, वह इस पृथ्वी-तल पर स्मरहर शिव के तुल्य हो जाता है।