वशी लक्षं मन्त्रं प्रजपति हविष्याशनरतो
दिवा मातर्युष्मच्चरणयुगलध्याननिपुणः ।
परं नक्तं नग्नो निधुवनविनोदेन च मनुं
जपेल्लक्षं स स्यात् स्मरहरसमानः क्षितितले ॥२०॥
vaśī lakṣaṃ mantraṃ prajapati haviṣyāśana-rato |
divā mātar yuṣmac-caraṇa-yugala-dhyāna-nipuṇaḥ |
paraṃ naktaṃ nagno nidhuvana-vinodena ca manuṃ |
japel lakṣaṃ sa syāt smara-hara-samānaḥ kṣiti-tale ||20||
śikhariṇī
हे माता! जो जितेन्द्रिय साधक हविष्यान्न पर रहकर, दिन में तेरे दोनों चरण-कमलों के ध्यान में निपुण होकर एक लाख बार तेरा मन्त्र जपता है, और फिर रात्रि में नग्न होकर रति-क्रीड़ा के विनोद के साथ एक लाख बार जपता है, वह इस पृथ्वी-तल पर स्मरहर शिव के तुल्य हो जाता है।