इदं स्तोत्रं मातस्तव मनुसमुद्धारणजनुः
स्वरूपाख्यं पादाम्बुजयुगलपूजाविधियुतम् ।
निशार्धं वा पूजासमयमधि वा यस्तु पठति
प्रलापस्तस्यापि प्रसरति कवित्वामृतरसः ॥२१॥
idaṃ stotraṃ mātas tava manu-samuddhāraṇa-januḥ |
svarūpākhyaṃ pādāmbuja-yugala-pūjā-vidhi-yutam |
niśārdhaṃ vā pūjā-samayam adhi vā yas tu paṭhati |
pralāpas tasyāpi prasarati kavitvāmṛta-rasaḥ ||21||
śikhariṇī
हे माता, यह स्तोत्र — जो तेरे मन्त्र के उद्धार से उत्पन्न हुआ है, ‘स्वरूप’ नाम से प्रसिद्ध है, और तेरे चरण-कमल-युगल की पूजा-विधि से युक्त है — जो भी मनुष्य आधी रात को अथवा पूजा के समय इसे पढ़ता है, उसका टूटा-फूटा प्रलाप भी काव्य-अमृत-रस की धारा बनकर बहने लगता है।