Karpūrādi Stotra · 1.21

Karpūrādi Stotra 1.21

1.21
इदं स्तोत्रं मातस्तव मनुसमुद्धारणजनुः स्वरूपाख्यं पादाम्बुजयुगलपूजाविधियुतम् । निशार्धं वा पूजासमयमधि वा यस्तु पठति प्रलापस्तस्यापि प्रसरति कवित्वामृतरसः ॥२१॥
idaṃ stotraṃ mātas tava manu-samuddhāraṇa-januḥ | svarūpākhyaṃ pādāmbuja-yugala-pūjā-vidhi-yutam | niśārdhaṃ vā pūjā-samayam adhi vā yas tu paṭhati | pralāpas tasyāpi prasarati kavitvāmṛta-rasaḥ ||21||
śikhariṇī
— यह ; — स्तोत्र ; — हे माता ; — तेरा ; — तेरे मन्त्र के उद्धार से प्रसूत ; — 'स्वरूप' नाम से प्रसिद्ध ; — तेरे चरण-कमल-युगल की पूजा-विधि से युक्त ; — अर्ध-रात्रि में ; — अथवा ; — पूजा-समय में ; — अथवा ; — जो ; — तो ; — पढ़ता है ; — बकवास, असम्बद्ध बोल ; — उसका ; — भी ; — प्रवाहित होता है ; — कविता-अमृत के रस के रूप में

हे माता, यह स्तोत्र — जो तेरे मन्त्र के उद्धार से उत्पन्न हुआ है, ‘स्वरूप’ नाम से प्रसिद्ध है, और तेरे चरण-कमल-युगल की पूजा-विधि से युक्त है — जो भी मनुष्य आधी रात को अथवा पूजा के समय इसे पढ़ता है, उसका टूटा-फूटा प्रलाप भी काव्य-अमृत-रस की धारा बनकर बहने लगता है।