Karpūrādi Stotra · 1.22

Karpūrādi Stotra 1.22

1.22
कुरङ्गाक्षीवृन्दं तमनुसरति प्रेमतरलं वशस्तस्य क्षोणीपतिरपि कुबेरप्रतिनिधिः । रिपुः कारागारं कलयति च तं केलिकलया चिरं जीवन्मुक्तः प्रभवति स भक्तः प्रतिजनुः ॥२२॥
kuraṅgākṣī-vṛndaṃ tam anusarati prema-taralaṃ | vaśas tasya kṣoṇī-patir api kubera-pratinidhiḥ | ripuḥ kārāgāraṃ kalayati ca taṃ keli-kalayā | ciraṃ jīvan-muktaḥ prabhavati sa bhaktaḥ pratijanuḥ ||22||
śikhariṇī
— मृगनयनी नारियों का समूह ; — उसका ; — अनुसरण करता है ; — प्रेम से कम्पित ; — वशीभूत ; — उसका ; — पृथ्वी-पति, राजा ; — भी ; — कुबेर-तुल्य (धन में) ; — शत्रु ; — कारागार को ; — मानता है, समझता है ; — और ; — उसको ; — क्रीड़ा-कला के अंशमात्र ; — चिरकाल ; — जीवन्मुक्त ; — हो जाता है ; — वह ; — भक्त ; — प्रत्येक जन्म में

मृग-नयनी नारियों का समूह प्रेम से विह्वल होकर उस भक्त के पीछे चलता है; पृथ्वी का राजा भी उसके वश में हो जाता है, और वह स्वयं कुबेर के समान धनी होता है; शत्रु और कारागार को वह केवल खेल का एक छोटा-सा अंश समझता है; और वह भक्त जीवन्मुक्त होकर जन्म-जन्मान्तर तक चिरकाल विजयी रहता है।