ईशो वैश्वानरस्थः शशधरविलसद्वामनेत्रेण युक्तो
बीजं ते द्वन्द्वमन्यद् विगलितचिकुरे कालिके ये जपन्ति ।
द्वेष्टारं घ्नन्ति ते च त्रिभुवनमपि ते वश्यभावं नयन्ति
सृक्कद्वन्द्वास्रधाराद्वयधरवदने दक्षिणे त्र्यक्षरेति ॥३॥
īśo vaiśvānara-sthaḥ śaśadhara-vilasad-vāma-netreṇa yukto |
bījaṃ te dvandvam anyad vigalita-cikure kālike ye japanti |
dveṣṭāraṃ ghnanti te ca tribhuvanam api te vaśya-bhāvaṃ nayanti |
sṛkka-dvandvāsra-dhārā-dvaya-dhara-vadane dakṣiṇe tryakṣareti ||3||
śārdūlavikrīḍita
— ईश — 'ह' अक्षर का सांकेतिक नाम; — वैश्वानर (अग्नि) में स्थित — अर्थात् 'र' अक्षर से युक्त; — चन्द्रमा से दीप्त वाम-नेत्र (ई) से; — युक्त — अर्थात् ह्रीं; — बीज-मन्त्र; — तेरा; — युगल, दोहरा (ह्रीं ह्रीं); — अन्य; — हे विकीर्ण-केशा; — हे कालिके; — जो लोग; — जपते हैं; — शत्रु, द्वेष करने वाले को; — मारते हैं; — वे; — और; — तीनों लोकों को; — भी; — वे; — वशीभूत अवस्था में; — ले आते हैं; — हे मुख के दोनों कोनों से रक्त की दो धाराएँ बहाने वाली; — हे दक्षिणा (दक्षिणमुखी काली); — त्र्यक्षर (तीन-अक्षरी मन्त्र); — इस प्रकार
हे खुली केशराशि वाली कालिके, हे दक्षिणे, जिसके मुख के दोनों कोनों से रक्त की दो धाराएँ बह रही हैं! जो साधक तेरे तीसरे युगल बीज को — ईश (क) को अग्नि-स्थित (र) और चन्द्रमा-सहित वाम-नेत्र (ई) से युक्त करके — जपते हैं, वे अपने शत्रुओं का नाश करते हैं और तीनों लोकों को अपने वश में कर लेते हैं। इस प्रकार तेरा त्र्यक्षर मन्त्र पूर्ण होता है।