ऊर्ध्वे वामे कृपाणं करकमलतले छिन्नमुण्डं तथाधः
सव्ये चाभीर्वरं च त्रिजगदघहरे दक्षिणे कालिके च ।
जप्त्वैतन्नाम ये वा तव मनुविभवं भावयन्त्येतदम्ब
तेषामष्टौ करस्थाः प्रकटितरदने सिद्धयस्त्र्यम्बकस्य ॥४॥
ūrdhve vāme kṛpāṇaṃ kara-kamala-tale chinna-muṇḍaṃ tathādhaḥ |
savye cābhīr varaṃ ca trijagad-agha-hare dakṣiṇe kālike ca |
japtvaitan nāma ye vā tava manu-vibhavaṃ bhāvayanty etad amba |
teṣām aṣṭau karasthāḥ prakaṭita-radane siddhayas tryambakasya ||4||
sragdharā
हे माँ कालिके, हे तीनों लोकों के पापों को हरने वाली, हे दाँत खोलकर दिखाने वाली दक्षिणा! तेरे ऊपरी बायें कर-कमल में कृपाण और नीचे वाले में कटा हुआ मुण्ड है, तथा दायीं ओर अभय और वर मुद्राएँ हैं। जो साधक तेरा यह नाम जपकर तेरे मन्त्र के माहात्म्य का ध्यान करते हैं, उनके हाथों में त्र्यम्बक शिव की अष्टसिद्धियाँ निवास करती हैं।