Karpūrādi Stotra · 1.2

Karpūrādi Stotra 1.2

1.2
ईशानः सेन्दुवामश्रवणपरिगतो बीजमन्यन्महेशि द्वन्द्वं ते मन्दचेता यदि जपति जनो वारमेकं कदाचित् । जित्वा वाचामधीशं धनमपि च चिरं मोहयन्नम्बुजाक्षीवृन्दं चन्द्रार्धचूडे प्रभवति स महाघोरबालावतंसे ॥२॥
īśānaḥ sendu-vāma-śravaṇa-parigato bījam anyan maheśi | dvandvaṃ te manda-cetā yadi japati jano vāram ekaṃ kadācit | jitvā vācām adhīśaṃ dhanam api ca ciraṃ mohayann ambujākṣī-vṛndaṃ | candrārdha-cūḍe prabhavati sa mahāghora-bālāvataṃse ||2||
śārdūlavikrīḍita
— ईशान — 'ह' अक्षर का सांकेतिक नाम ; — अर्धचन्द्र और वाम-कर्ण (ऊ) से युक्त — अर्थात् हूँ ; — बीज-मन्त्र ; — दूसरा, अन्य ; — हे महेशी ; — युगल, दोहरा (हूँ हूँ) ; — तेरा ; — मन्द-बुद्धि ; — यदि ; — जपता है ; — मनुष्य ; — एक बार ; — कभी ; — जीतकर ; — वाणी के स्वामी (बृहस्पति) को ; — धन ; — भी ; — और ; — चिरकाल तक ; — मोहित करता हुआ ; — कमल-नयना नारियों का समूह ; — हे अर्धचन्द्र-मुकुटधारिणी ; — समर्थ होता है ; — वह ; — हे महाघोर बालकों की खोपड़ियों से सुशोभिता

हे महेशी, हे अर्धचन्द्र-मुकुटधारिणी, हे बालकों की खोपड़ियों से सुशोभित महाघोरा! यदि कोई मन्दबुद्धि मनुष्य भी कभी एक बार तेरे दूसरे युगल बीज को — ईशान (ह) को अर्धचन्द्र और वाम-कर्ण से युक्त करके, दोहरे रूप में — जप ले, तो वह वाणी के स्वामी बृहस्पति को भी जीत लेता है, चिरकाल तक धन-सम्पदा पाता है, और कमल-नयना नारियों के समूह को मोहित कर लेता है।